November 26, 2022
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छत्तीसगढ़ ने रचा इतिहास. पहली बार ब्रेन डेड का आर्गन ट्रांसप्लांट

रायपुर

छत्तीसगढ़ में पहली बार कैडेबर ट्रांसप्लांट-यानी ब्रेन डेड व्यक्ति से निकाले गए अंगों को दूसरे मरीजों में लगाने की सर्जरी हुई है। इसके लिए रायपुर के एक निजी अस्पताल में 100 से अधिक डॉक्टराें-तकनिशियनों की टीम ने लगातार 32 घंटे तक सर्जरी की। ब्रेन डेड हो चुकी 44 वर्षीय महिला के शरीर से किडनी और लीवर निकालकर तीन मरीजों को तो वहीं लगा दिया गया। शेष अंगों को अलग-अलग अस्पतालों को भेजा गया है, जहां वह जल्दी ही जरूरतमंदों के काम आएंगे।

रायपुर में कबीर नगर की रहने वाली 44 वर्षीय अमरजीत कौर को ब्रेन स्ट्रोक की वजह से ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया था। उनके परिजनों ने अंगदान की इच्छा जताई और प्रशासन ने उनके नेक काम में मदद की। रायपुर स्थित रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक डॉ. संदीप दवे ने बताया, हमें पता चला कि शहर में ब्रेन डेड का एक केस है, जिसमें परिजन कैडेवर आर्गन डोनेशन के लिए तैयार हैं। इसके बाद हमने तैयारी शुरू कर दी। कोई चूक न हो, इसके लिए 100 से अधिक डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ की टीम बनाई। परिजनों को भावनात्मक सपोर्ट देने के लिए एक काउंसलिंग टीम पूरे समय उनके साथ रही।

शुक्रवार को रात 9.30 बजे जब डोनर हमारे अस्पताल में पहुंची, तब सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए दो बार टेस्ट किए कि वह वाकई ब्रेन डेड हैं। दोनों टेस्ट पॉजिटिव रहे यानी उनके ब्रेन डेड की दोबारा पुष्टि हो गई। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग की टीम भी हमारे साथ थी। डोनर के ब्रेन डेड होने की 6 घंटे में अंतिम पुष्टि के साथ स्वास्थ्य विभाग ने उन मरीजों को भी अस्पताल पहुंचा दिया, जिनके शरीर में ब्रेन डेड डोनर के अंग लगने थे। इस तरह की तैयारी के बाद हमारी टीम ने इतिहास बना दिया। सरकार ने तो सहयोग किया ही, ब्रेन डेड महिला अमरजीत कौर के परिजनों ने जिस उदारता का परिचय दिया वह बेमिसाल है।

बेहद चुनौतीपूर्ण था ऑर्गन ट्रांसप्लांट का पूरा ऑपरेशन

डॉक्टरों ने बताया, कैडेवर डोनर के शरीर से किडनी, लीवर, आंख, हार्ट वाल्व आदि निकालने के बाद पूरी प्रक्रिया का हर पल महत्वपूर्ण था। एक मिनट की भी चूक नहीं की जा सकती थी। सामान्य शरीर की तुलना में ब्रेन डेड को एनस्थीसिया देने से लेकर शरीर से अंग निकालने तक की प्रक्रिया अलग थी। अंग निकालने के दौरान इंफेक्शन और शरीर को स्थिर बनाये रखने जैसी कई अहम बातें थीं। ब्रेन डेड डोनर के ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव की आशंकाएं भी थीं। आर्गन निकालकर तुरंत दूसरे मरीज को लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इस तरहए 32 घंटे में एक-एक पल कीमती रहा।

डोनर का शरीर ऑपरेशन थिएटर से निकला तो सभी ने किया नमन

अस्पताल प्रबंधन का कहना है, डोनर के परिजनों का आग्रह था कि अंगदान के बाद उन्हें शाम साढ़े 3 बजे तक अंतिम संस्कार के लिए शव मिल जाए। ऐसे में पूरी टीम को दिन-रात काम करना पड़ा। अंत में भावुक पल भी आया, जब डोनर के पार्थिव शरीर को परिजनों को सौंपते वक्त अस्पताल के पूरे स्टॉफ ने कतारबद्ध होकर उनके सम्मान में दो मिनट का मौन रखा। डोनर का शरीर परिजन को सौंपने के बाद किडनी, लीवर समेत बाकी ऑर्गन का ट्रांसप्लांट शनिवार 3 बजे से रविवार को भोर में 4 बजे तक लगातार चला।

पति बोले-दु:ख बहुत है लेकिन दूसरों के काम आने का सुकुन उससे बड़ा

कबीरनगर के रहने वाले सुरेंदर सिंह ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया, यह सोमवार 14 नवम्बर की बात है। सुबह तक सब कुछ सामान्य था। पूरे परिवार ने साथ बैठकर नास्ता किया। उसके बाद वे काम पर निकल गये। उनकी पत्नी दरवाजे तक उन्हें छोड़ने आई थीं। करीब एक घंटे बाद उन्होंने सिरदर्द की जानकारी दी। सबको लगा कि गैस की वजह से सिरदर्द हो रहा होगा। वे लोग उन्हें अस्पताल ले गये। वहां डॉक्टर ने एमआरआई कराई तो ब्रेन हैमरेज का पता चला।

उसी रात ऑपरेशन हुआ। उस दिन स्थिति सामान्य थी। बाद में हालत बिगड़ती गई और शुक्रवार को उन्हें ब्रेन डेड घाेषित कर दिया गया। परिचितों में से ही किसी ने अंगदान की सलाह दी। मैंने डॉ. विनीत जैन से बात की। उन्होंने इसके लिए समझाया फिर पूरे परिवार से सलाह करके अंगदान का फैसला ले लिया गया। सुरेंदर कहते हैं, उनको दु:ख बहुत है लेकिन उनकी पत्नी मरने के बाद भी दूसरों को जीवन दे गई इसका सुकुन उससे भी बड़ा है।

जिनको किडनी-लीवर लगाया वे अभी ठीक हैं

डॉ. संदीप दवे ने बताया, जिन मरीजों को किडनी और लीवर ट्रांसप्लांट किया गया है, वे सभी पूरी तरह स्वस्थ हैं। पूरी प्रक्रिया और उसके बाद क्रिटिकल केयर की भूमिका सामान्य केस की तुलना में अधिक बढ़ जाती है। इसलिए अगले कुछ महीनों तक इन मरीजों को बेहद सावधानी रखनी होगी। डॉक्टरों की टीम इनकी लगातार मॉनिटरिंग करेगी। डिस्चार्ज होने के बाद भी फॉलोअप चलेगा।

जरूर पड़ने पर नहीं मिल पाता मानव अंग

डॉ. संदीप दवे का कहना है, अंगदान को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है, चाहे डोनर जीवित हो या फिर ब्रेन डेड। देश में हर साल 80 हजार से अधिक लीवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है। लेकिन केवल 700 से 800 डोनर ही मिल पाते हैं। किडनी के 2 लाख डोनर की जरूरत है, लेकिन दानदाता 10 से 15 हजार ही मिलते हैं।

ब्रेन डेड के शरीर से यह अंग निकाले जाते हैं

डॉक्टरों का कहना है, ब्रेन डेड डोनर के शरीर से 12 अंग दूसरे मरीजों को लगाने के काम आते हैं। इसमें 2 किडनी, 2 कार्निया, लंग्स, ब्लड वेसल्स, मसल्स और लिगामेंट, कर्टिलेजस, हार्ट वॉल्व, लीवर, बोनमेरो, स्किन और पैंक्रियाज शामिल हैं। रायपुर में भी डोनर से यही अंग लिए गए। इसमें से किडनी और लीवर को तो तुरंत ही दूसरे मरीजों को लगा दिया गया है। वहीं कॉर्निया एम्स गया। तीन हर्ट वॉल्व सत्य साईं को भेजा गया। जहां दूसरे मरीजों को लगाया जाएगा।

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